हॉस्टल में सीखी उद्यमशीलता
कॉलेज के दौरान हितेश नागदेवी में एक छात्रावास में रहकर पढ़ाई कर रहे थे। उद्यमशीलता की परिभाषा उन्होंने यहीं से सीखी। हॉस्टल में रहते हुए ही उन्होंने जीवन-यापन करने की मूलभूत आवश्यकताओं को महसूस किया। हितेश ने पारंपरिक नौकरी के रास्ते पर न चलकर अपना खुद का व्यवसाय शुरू करने की ठानी। हॉस्टल का जीवन उनकी सफलता की यात्रा में एक महत्वपूर्ण पड़ाव था। पढ़ाई के दौरान दोशी ने हार्डवेयर, इलेक्ट्रॉनिक्स और इंस्ट्रूमेंट गेज का कारोबार शुरू करने के लिए अपने एक रिश्तेदार से 5,000 रुपये उधार लिए। इससे होने वाले मुनाफे से उन्होंने अपने रहने-खाने के खर्च और कॉलेज की फीस का भुगतान किया। बचत का एक हिस्सा वह अपने पिताजी को भी भेजा करते थे।
गांव के मंदिर के नाम पर कंपनी
स्नातक करने के बाद, उन्होंने खुद की कंपनी स्थापित करने के लिए बैंक से डेढ़ लाख रुपये का लोन लिया। इसमें दबाव गेज, गैस स्टेशन उपकरण और औद्योगिक वाल्व का उत्पादन होता था। 1989 में, उन्होंने आधिकारिक तौर पर अपनी कंपनी ‘वारी इंस्ट्रूमेंट्स’ को पंजीकृत कराया। 1992 में, हितेश ने अंधेरी में 300 वर्ग फुट की जगह किराये पर लेकर कंपनी का विस्तार किया। 2007 में, जर्मनी में एक व्यापार प्रदर्शनी के दौरान सौर ऊर्जा की क्षमता को देखकर वह काफी प्रभावित हुए और थर्मल तथा सौर उपकरण निर्माण करने का निर्णय लिया। उनका शुरुआती लक्ष्य यूरोपीय बाजार था, क्योंकि तब तक भारतीय बाजार सौर उत्पादों के लिए पूरी तरह से तैयार नहीं था। बाद में, इसका विस्तार चीन, अमेरिका और जापान तक हो गया। कंपनी को पहली बार सबसे बड़ा ऑर्डर अमेरिका और यूरोप के ग्राहकों से आया। फिर क्या था हितेश सफलता की ऐसी गाड़ी पर सवार हुए, जो कभी रुकी नहीं। उन्होंने अपने गांव के वारी मंदिर के नाम पर कंपनी का नाम वारी एनर्जीज रखा है।
युवाओं को सीख