रिश्तेदारों ने सोचा मैं पापा का बिजनेस नहीं संभाल सकूंगा, लेकिन पिता की मौत ने मुझे एक रात में बड़ा बना दिया

Sep 04, 2025
Struggles journey Articale
रिश्तेदारों ने सोचा मैं पापा का बिजनेस नहीं संभाल सकूंगा, लेकिन पिता की मौत ने मुझे एक रात में बड़ा बना दिया

रिश्तेदारों ने सोचा मैं पापा का बिजनेस नहीं संभाल सकूंगा, लेकिन पिता की मौत ने मुझे एक रात में बड़ा बना दिया

जब तक सिर पर पिता का साया था तब तक करण गुप्ता समझ नहीं पाए कि उनके जाने के बाद जिंदगी कितनी मुश्किल हो जाएगी। पिता के निधन के बाद हंसता-खेलता करण छोटी उम्र में ही घर का गार्जियन बन गया।


पिता की कमाई अच्छी हो तो बच्चों का बचपन बेफिक्री में बीतता है। बिजनेसमैन पिता के बेटे करण गुप्ता का बचपन भी शान से गुजर रहा था। स्कूल के बाद दोस्तों के साथ घूमना-फिरना। किसी बात की कोई चिंता नहीं।


लेकिन जैसे ही पिता बीमार हुए करण के चेहरे की खिलखिलाहट अचानक संजीदगी में बदल गई। करण ने पहली बार अपने पिता को कमजोर पड़ते देखा। जब पिता का साथ छूटा तो करण का एक अलग ही चेहरा सामने आया।पुरुष पक्षमें आज हम एक ऐसे युवा का जिक्र कर रहे हैं जिसने पिता के जाने के बाद छोटी उम्र में ही परिवार को संभाला और पिता के बिजनेस को भी आगे बढ़ाया।

पापा की मौत के बाद जिंदगी बदल गई


मेरी तीन बड़ी बहनों ने हम दोनों छोटे भाइयों को हमेशा प्यार से रखा। मिर्जापुर में हमारा खानदानी ज्वेलरी का बिजनेस था। पापा कमाई अच्छी थी इसलिए किसी चीज की कोई कमी नहीं थी। मैं पढ़ाई में एवरेज था। दोस्तों के साथ घूमना फिरना मुझे अच्छा लगता था। स्कूल की पढ़ाई के दौरान मैं घर के काम या पापा के बिजनेस में कोई दिलचस्पी नहीं लेता था। पापा ने भी कभी रोका टोका नहीं। पापा बहुत दिलदार थे। खुद आगे बढ़कर लोगों की मदद करते थे।

बारहवीं के बाद मेरा कॉलेज में एडमिशन हुआ ही था कि पापा की तबीयत बिगड़ने लगी। सबसे पहले पापा को जॉइंडिस हुआ। फिर उनका ब्लड प्रेशर हाई रहने लगा। लिवर खराब होने लगा।


पापा के बीमार होने की वजह थी अपने ही परिवार और दोस्तों से धोखा मिलना। परिवार ने जायदाद हथिया ली और दोस्त कर्ज में लिए पैसे लौटाने में आनाकानी करने लगे। पापा बिल्कुल अकेले पड़ गए। तब हम छोटे थे। हम उनकी कोई मदद नहीं कर पा रहे थे।


पापा उस दौरान लगभग रोज ही शराब पीते थे। डॉक्टर ने शराब पीने के लिए साफ मना किया था। जब पापा नहीं मानते थे तो मैं उनसे नाराज हो जाता था। कई बार मैंने उन्हें शराब पीने से रोका। तब पापा रोने लगते और कहते, “मैं जानता हूं कि शराब मेरे लिए सही नहीं है। लेकिन बिना शराब के मुझे वो सारी बातें याद आती हैं जिनकी वजह से मेरी ये हालत हुई है। मैं वो सारी बातें भूल जाना चाहता हूं।


उस दौरान मैंने पहली बार पापा को रोते हुए देखा था। मेरे पापा दुनिया की हर मुसीबत झेल जाते थे। लेकिन अपनों से मिले धोखे को वो सहन नहीं कर पा रहे थे। पापा की तबीयत बिगड़ती गई और आखिरकार वो हमें छोड़कर इस दुनिया से चले गए।जब तक पापा थे तब तक हमारी आर्थिक स्थिति बहुत अच्छी थी। मैं अपने दोस्तों को बाइक पर घुमाता। उन पर पैसे लुटाता। पहले तो पापा कुछ नहीं कहते थे, लेकिन जब वो बीमार रहने लगे तो समझाते थे कि मुसीबत में हर दोस्त काम आए ये जरूरी नहीं।

पापा शायद समझ रहे थे कि उनके पास अब ज्यादा समय नहीं है। बीमारी के दौरान वो मुझे हमारी ज्वेलरी की दुकान संभालने को कहते थे। उन्हें मेरा दोस्तों के भटकना अच्छा नहीं लगता था। तब मुझे पापा की रोक टोक अच्छी नहीं लगती थी, लेकिन उनके जाने के बाद उनकी बातें याद आने लगीं।

पापा के जाने के बाद दुकान संभालने की जिम्मेदारी मुझ पर गई। मैं तब तक ज्वेलरी बिजनेस के बारे में कुछ नहीं जानता था। धनतेरस के दिन मैं अपने दोस्त को लेकर हमारी दुकान का बैनर बनाने के लिए गया। आधे घंटे में दोस्त ने कहा कि वो अब और नहीं रुक सकता। उसे कोई काम नहीं था, लेकिन अब उसे मेरी दोस्ती में फायदा नहीं दिखा रहा था।

दोस्त के जाने के बाद मुझे पापा की कही बातें याद आने लगीं कि सबसे पहले अपने परिवार से दोस्ती करो। वो तुम्हारा साथ कभी नहीं छोड़ेंगे। लेकिन घर से बाहर के ज्यादातर दोस्त तुमसे मतलब के लिए दोस्ती करते हैं।


मेरा ये मानना है कि नेकी हमेशा काम आती है। जब हमारे परिवार का जॉइंट बिजनेस था तब पापा ने एक कारीगर की नौकरी बचाई थी। वो अपने हिस्से के पैसों में से उसे सैलरी देते थे।


पापा के जाने के बाद रिश्तेदारों ने सोचा कि मैं उनका बिजनेस नहीं संभाल सकूंगा। लेकिन पापा के उस कारीगर ने मुझे बिजनेस सिखाया जिसे वो अपने हिस्से के पैसों में से सैलरी देते थे।


पापा की नेकी मेरे काम आई। भगत जी ने मुझे ज्वेलरी बिजनेस की सभी बारीकियां सिखाईं। अब तो मैंने पापा के बिजनेस को बहुत आगे बढ़ा चुका हूं। ये सब पापा की मेहनत का फल है।पापा के जाने के बाद रातोंरात मुझे इस बात का एहसास हो गया कि अब मुझे घर का गार्जियन बनना है। मैंने उस दौरान खुद को बहुत कमजोर महसूस किया। लेकिन मैंने अपनी भावनाएं मां, छोटे भाई और तीनों बहनों के सामने नहीं आने दी।


रिश्तेदार हम से पहले ही मुंह मोड़ चुके थे। वो नहीं चाहते थे कि मैं पापा का बिजनेस सांभालूँ। कई बार मैंने खुद को बेहद अकेला महसूस किया। तब मैं पापा की तस्वीर के आगे अकेले में खूब रो लेता था। लेकिन मैंने अपने परिवार को कभी ये महसूस नहीं होने दिया कि मुझ पर क्या बीत रही है।


मैंने अपनी बहनों और छोटे भाई को कभी ये महसूस नहीं होने दिया कि अब पिता नहीं हैं तो उन्हें किसी भी तरह के अभाव में जीने की जरूरत है। मुझसे जितना हो सका मैंने अपने परिवार के लिए और हमेशा करता रहूंगा।


मुझे लगता है, हताशा के पल पुरुष को और मजबूत बनाते हैं। मैंने अपने पिता के चेहरे पर हताशा तब देखी जब उन्हें ये चिंता सताने लगी कि उनके जाने के बाद परिवार का क्या होगा। मैंने उनकी हताशा को अपनी ताकत बनाकर उनकी चिंता दूर कर दी।

https://navbharattimes.indiatimes.com/lifestyle/relationship/how-losing-father-affects-young-children-karan-gupta-shares-his-struggles-journey/articleshow/123683063.cms?story=5

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